रविवार, जून 07, 2015
बुधवार, फ़रवरी 19, 2014
मै भूल जाऊं तुम्हें अब यही मुनासिब है....
मै भूल जाऊं तुम्हें अब यही मुनासिब है
मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं
कि तुम तो फिर भी हकीकत हो कोई ख्वाब नहीं
यहाँ तो दिल के ये आलम क्या कहूं "कमबख्त"
भुला सका ना ये वो सिलसिला जो था ही नहीं
वो एक ख्याल जो आवाज तक गया ही नहीं
वो एक बात जो मै कह नहीं सका तुमसे
वो एक रब्त जो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं
अगर यह हाल है दिल का तो कोई समझाए
तुम्हे भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं
कि तुम तो फिर भी हकीकत हो कोई ख्वाब नहीं
ख्वाब = Dream, रब्त = Relation, हकीकत = Reality, कमबख्त = Idiot, आलम = Situation
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Naren
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3:21 am
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Labels: chahat, Jagjit, Javed Akhtar
गुरुवार, मई 03, 2007
कभी यूं भी तो हो
Another melody by Jagjit Singh. This is pened by Javed Akhtar.
कभी यूं भी तो हो,
कभी यूं भी तो हो
दरिया का साहिल हो,
पुरे चांद कि रात हो,
और तुम आओ
कभी यूं भी तो हो,
कभी यूं भी तो हो
परियों कि महफ़िल हो,
कोई तुम्हारी बात हो,
और तुम आओ
कभी यूं भी तो हो,
कभी यूं भी तो हो
यह नरम मुलायम ठण्डी हवायें,
जब घर से तुम्हारे गुजरे,
तुम्हारी खूस्बू चुराएँ,
मेरे घर ले आंये,
कभी यूं भी तो हो,
कभी यूं भी तो हो
सूनी हर महफ़िल हो,
कोई ना मेरे साथ हो,
और तुम आओ.
कभी यूं भी तो हो,
कभी यूं भी तो हो
यह बादल ऐसे टूट के बरसे,
मेरे दिल कि तरह मिलने को,
तुम्हारा दिल भी तरसे,
तुम निकलो घर से,
कभी यूं भी तो हो,
कभी यूं भी तो हो
तनहाई हो दिल हो,
बुद्ने हो बरसात हो,
और तुम आओ.
कभी यूं भी तो हो,
कभी यूं भी तो हो
दरिया का साहिल हो,
पूरे चांद कि रात हो,
और तुम आओ
कभी यूं भी तो हो,
कभी यूं भी तो हो
Posted by
Naren
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10:56 pm
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