मै भूल जाऊं तुम्हें अब यही मुनासिब है....
A beutiful gazal pened by Javed Akhtar and Sung by Jagjit Singh.
मै भूल जाऊं तुम्हें अब यही मुनासिब है
मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं
कि तुम तो फिर भी हकीकत हो कोई ख्वाब नहीं
यहाँ तो दिल के ये आलम क्या कहूं "कमबख्त"
भुला सका ना ये वो सिलसिला जो था ही नहीं
वो एक ख्याल जो आवाज तक गया ही नहीं
वो एक बात जो मै कह नहीं सका तुमसे
वो एक रब्त जो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं
अगर यह हाल है दिल का तो कोई समझाए
तुम्हे भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं
कि तुम तो फिर भी हकीकत हो कोई ख्वाब नहीं
ख्वाब = Dream, रब्त = Relation, हकीकत = Reality, कमबख्त = Idiot, आलम = Situation
मै भूल जाऊं तुम्हें अब यही मुनासिब है
मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं
कि तुम तो फिर भी हकीकत हो कोई ख्वाब नहीं
यहाँ तो दिल के ये आलम क्या कहूं "कमबख्त"
भुला सका ना ये वो सिलसिला जो था ही नहीं
वो एक ख्याल जो आवाज तक गया ही नहीं
वो एक बात जो मै कह नहीं सका तुमसे
वो एक रब्त जो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं
अगर यह हाल है दिल का तो कोई समझाए
तुम्हे भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूं
कि तुम तो फिर भी हकीकत हो कोई ख्वाब नहीं
ख्वाब = Dream, रब्त = Relation, हकीकत = Reality, कमबख्त = Idiot, आलम = Situation


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