गुरुवार, अप्रैल 10, 2008

यह भी क्या एहसान कम है

The "Passion" also known as Black Magic was one of my first Album in Gazals. After listening for the first time I was literally in love with the Gazals. The beauty was everywhere, in words, in music and in soothing voice of Jagjit Singh. The gazal is penned by Wajida Tabassum.

यह भी क्या एहसान कम है देखिये आपका,
हो रहा है हर तरफ़ चर्चा हमारा आपका

चाँद सूरज धुप सुबह कहकशां तारे समां,
हर उजाले ने चुराया है उजाला आपका

चाँद में तो दाग पर आप में वह भी नही,
चौधाह्वी के चाँद से बढ़के है चेहरा आपका

इश्क में ऐसे भी हम डूबे हुए हैं आप के,
अपने चेहरे पे सदा होता है धोखा आपका

बुधवार, मार्च 19, 2008

बेनाम सा यह दर्द ठहर क्यों नही जाता

I don't know who penned these lines but these are simply superb.

बेनाम सा यह दर्द ठहर क्यों नही जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नही जाता
बेनाम सा यह ...


सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें
क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यूं नही जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूं नही जाता


वो एकही चेहरा तो नही सारे जहाँ मैं
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नही जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूं नही जाता
बेनाम सा यह....


मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते है जिधर सब मैं उधर क्यूं नही जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूं नही जाता


वो नाम जो बरसों से न चेहरा है न बदन है
वो ख्वाब अगर है टू बिखर क्यूं नही जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूं नही जाता
बेनाम सा यह....



शुक्रवार, जून 01, 2007

जवानी के हीले हया के बहाने

This is one the romantic Gazal and my favorite too. Gazal is penned by Sudarhan Faakir and Sung by Jagjit Singh. The gazal is part of Album Black Magic also known as Passion (one of my very first Gazal album) .


जवानी के हीले हया के बहाने
यह माना की तुम मुझसे परदा करोगी
यह दुनिया मगर तुझ सी भोली नही है
छुपा के मुहब्बत को रुशवा करोगी

बड़ी कोशिसो से बड़ी ख्वाहिशों से
तमन्ना की सहमी हुई सज़िशो से
मिलेगा जो मौका तो बेचैन होकर
दरीचों से तुम मुझको देखा करोगी

सताये की जब चांदनी की उदाशी
दुखाए की दिल जब फिजां की खामोशी
उफक की तरफ खाली नज़रें जमा कर
कभी जो ना सोचा वोह सोचा करोगी

कभी दिल की धड़कन मह्सूश होगी
कभी ठंढी सांसो के तूफ़ान उठेंगे
कभी गिर के बिस्तर पे आहें भरोगी
कभी झुक के तकिये पे रोया करोगी

जवानी के हीले हया के बहाने
यह माना की तुम मुझसे परदा करोगी
यह दुनिया मगर तुझ सी भोली नही है
छुपा के मुहब्बत को रुशवा करोगी

दिल के खुश रखने को

The beauty of Gazal lies in its wording. Sometimes I don't understand few words and that spoils the pleasure. There are lot of Gazals from legend Mirza Galib that I dont understand. But this gazal is very simple. The beauty of this Gazal inspires me to learn Urdu. As always its again sung by Jagjit Sigh. This Gazals feaures in his album named Mirage.

इक ब्राह्मन ने कहा है की येह साल अच्छा है

ज़ुल्म की रात बहुत जल्द ढलेगी अब तो
आग चुल्हों मे हर रोज जलेगी अब तो
भूख के मारे कोई बच्चा नही रोयेगा
चैन की नींद हर इक शख्श यहां सोयेगा

आंधी नफरत की चलेगी ना कहीँ अब के बरस
प्यार की फस्ल उगायेगी ज़मीन अब के बरस

है यकीन अब ना कोई शोर शराबा होगा
ज़ुल्म होगा ना कहीं ख़ून खराबा होगा
ओस और धूप के सदमें ना सहेगा कोई
अब मेरे देश मे बेघर ना रहेगा कोई

नये वादों का जो डाला है जाल अच्छा है
रहनुमाओं ने कहा है की येह साल अच्छा है

दिल के खुश रखने को ग़ालिब येह ख्याल अच्छा है
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब येह ख्याल अच्छा है

रविवार, मई 20, 2007

तेरे खुशबु में बसें ख़त

There are few gazals which will tear my heart apart. This is one of them. Each line makes a deep impact and hits the inner core. The gazal is penned by Rajendranath Rahbar, and is being sung by Jagjit Singh.

तेरे खुशबु में बसें ख़त मै जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुए ख़त मै जलाता कैसे
तेरे हाथो के लिखे ख़त मै जलाता कैसे

जिनको दुनिया कि निगाहों से छुपाये रक्खा
जिनको इक उम्र कलेजे से लगाए रक्खा
दीन जिनको जिन्हे ईमान बनाए रक्खा
तेरे खुशबु में बसें ख़त मै जलाता कैसे

जिनका हर लफ्ज़ मुझे याद था पानी की तरह
याद थे मुझको जो पैगामें ज़ुबानी की तरह
मुझको प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह
तेरे खुशबु में बसें ख़त मै जलाता कैसे

तुने दुनिया कि निगाहों से जो बच कर लिक्खे
साल हा साल मेरे नाम बराबर लिक्खे
कभी दिन में तो कभी रात को उठ्कर लिक्खे
तेरे खुशबु में बसें ख़त मै जलाता कैसे

प्यार में डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे हाथो के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ.
आग बहते हुये पानी में लगा आया हूँ.

It is a very sad part that I dont have any other gazal by Rajendranath Rahbar. I did a lot of searching on internet with no luck. If any one of you have any other gazal from this poet, please share with me.

सोमवार, मई 14, 2007

ए काश वो किसी दिन

This is a beautiful poem by Yogesh. The gazal is sung by Jagjit Singh and is part of one of his album called Many Facets. The is from a movie called "Hum Hain Pyar Mein". Though the movie was not at all hit, but its music was melodious, specially this song.

काश वो किसी दिन तनहाइयों में आयें,
उनको ये राजे दिल हम महफ़िल में क्या बतायें |

लगता है डर उन्हें तो हमराज़ लेके आयें,
जो पूछना है पूछे, कहना है जो सुनाएँ,
तौबा हमारी हम जो उन्हें हाथ भी लगाएँ |

काश वो किसी दिन तनहाइयों में आयें,
उनको ये राजे दिल हम महफ़िल में क्या बतायें|

उन्हें इश्क ग़र ना होता पलके नही झुकाते,
गालों पे सोख बादल, जुल्फो के ना गिरते,
कर दे ना क़त्ल हमको मासूम यह अदाएँ|

काश वो किसी दिन तनहाइयों में आयें,
उनको ये राजे दिल हम महफ़िल में क्या बतायें|

शुक्रवार, मई 04, 2007

उस मोड से शुरू करें फिर यह जिन्दगी

There are so many moments in my life where I would like to go back and relive those moments. Someone once said no matter how good or bad your past was, you will always love to remember those days. The poem below depicts the same feeling from author. The gazal is composed by Sudarshan Faakir and is beautifully sung by Jagjit and Chitra Singh.


उस मोड से शुरू करें फिर यह जिन्दगी
हर शय जहां हशीन थी हम तुम थे अजनबी

ले कर चले थे हम जिन्हे, जन्नत के ख्वाब थे
फूलो के ख्वाब थे वोह मुहब्बत के ख़्वाब थे
लेकिन कहां है इनमे वोह पहले सी दिलकशी
उस मोड से शुरू करें फिर यह जिन्दगी
हर शय जहां हशीन थी हम तुम थे अजनबी

रहते थे हम हशीन खयालो कि भीड़ में
उलझे हुए हैं आज सवालो कि भीड़ में
आने लगी है याद वोह फुरसत कि हर घड़ी
उस मोड से शुरू करें फिर यह जिन्दगी
हर शय जहां हशीन थी हम तुम थे अजनबी

शायद यह वक़्त हमसे कोई चाल चल गया
रिश्ता वफ़ा का और ही रंगो में ढल गया
अश्कोँ कि चांदनी से थी बेहतर वोह धुप ही
उस मोड से शुरू करें फिर यह जिन्दगी
हर शय जहां हशीन थी हम तुम थे अजनबी

गुरुवार, मई 03, 2007

कभी यूं भी तो हो

Another melody by Jagjit Singh. This is pened by Javed Akhtar.

कभी यूं भी तो हो,
कभी
यूं भी तो हो
दरिया का साहिल हो,
पुरे
चांद कि रात हो,
और
तुम आओ
कभी यूं भी तो हो,
कभी
यूं भी तो हो

परियों कि महफ़िल हो,
कोई
तुम्हारी बात हो,
और
तुम आओ
कभी यूं भी तो हो,
कभी
यूं भी तो हो

यह नरम मुलायम ठण्डी हवायें,
जब
घर से तुम्हारे गुजरे,
तुम्हारी
खूस्बू चुराएँ,
मेरे घर ले आंये,
कभी
यूं भी तो हो,
कभी
यूं भी तो हो

सूनी हर महफ़िल हो,
कोई
ना मेरे साथ हो,
और तुम आओ.
कभी यूं भी तो हो,
कभी
यूं भी तो हो

यह बादल ऐसे टूट के बरसे,
मेरे
दिल कि तरह मिलने को,
तुम्हारा
दिल भी तरसे,
तुम निकलो घर से,
कभी
यूं भी तो हो,
कभी
यूं भी तो हो

तनहाई हो दिल हो,
बुद्ने हो बरसात हो,
और
तुम आओ.
कभी यूं भी तो हो,
कभी
यूं भी तो हो
दरिया का साहिल हो,
पूरे
चांद कि रात हो,
और
तुम आओ
कभी यूं भी तो हो,
कभी
यूं भी तो हो



तुम इतना जो मुश्कुरा रहे हो

This song is taken from movie Arth. Here poet is trying to represent the dilemma of a bleeding heart. Its crying inside but there is someting else on the face. Somebody once said in this world nothing is being taken at its face value. It has to be polished and it has to be what its not.

तुम इतना जो मुश्कुरा रहे हो
क्या गम है जिसको छिपा रहे हो

आंखों में नमी, हसीं लाबो पर
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो

बन जायेंगे जहर पीते पीते
यह अश्क जो पीते जा रहे हो

जिन जख्मों को वक़्त भर चला है
तुम क्यों उन्हें छेड़े जा रहे हो

रेखाओं का खेल है मुकद्दर
रेखाओं से मात खा रहे हों

देर लगी आने मने तुमको

Another gem by the living legend. The gazal is penned by Andleeb Shadani.

देर लगी आने में तुमको, शुकर है फिर भी आये तो
आश ने दिल का साथ ना छोडा, वैसे हम घबराए तो .

सफक, धनुक, महताब, घ्टअय्ने, तारे, नगमें, बिजली, फूल.
उस दामन में क्या क्या कुछ है, वोह दामन हाथ में आये तो .

झूठ है सब तारीख हमेशा अपने को दोहराती है,
अच्छा मेरा खाबे जवानी, थोडा सा दोहराये तो .

सुनी सुनाई बात नही है अपने ऊपर बीती है,
फूल निकलते हैं शोलो से चाहत आग लगाए तो .